वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य में बदलते समीकरणों के बीच भारत ने अक्टूबर में 2.9 अरब डॉलर का रूसी कच्चा तेल खरीदा
हिन्दी रिपोर्ट
विश्व ऊर्जा बाज़ार में लगातार बदलते हालात और वैश्विक प्रतिबंधों के बीच भारत ने अक्टूबर महीने में रूस से लगभग 2.9 अरब डॉलर का कच्चा तेल आयात किया। यह आंकड़ा दर्शाता है कि भारत अभी भी रूस के लिए एक अहम ऊर्जा साझेदार बना हुआ है और दुनिया के बदलते व्यापार मार्गों के बावजूद भारत और रूस के बीच ऊर्जा सहयोग और मजबूत हो रहा है।
इस खरीद के साथ भारत ने एक बार फिर यह साबित किया कि वह चीन के बाद रूसी कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार है। पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए कड़े प्रतिबंधों के कारण रूस को अपनी तेल आपूर्ति एशियाई बाज़ारों की ओर मोड़नी पड़ी, और भारत इस अवसर का सबसे बड़ा लाभार्थी बनकर उभरा है।
भारत के लिए रूसी तेल क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है और अपनी आवश्यकता का लगभग 85% तेल आयात करता है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में थोड़ी भी वृद्धि घरेलू बाज़ार को प्रभावित कर सकती है। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ने भारत और चीन को भारी छूट के साथ तेल बेचना शुरू किया, जिसके कारण भारतीय रिफाइनरियों को कच्चे तेल की आपूर्ति कम दामों पर उपलब्ध होने लगी।
रूसी तेल का बढ़ता आयात भारत को कई तरह से फ़ायदे दे रहा है घरेलू पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं, रिफाइनरियों की मार्जिन में वृद्धि हुई है, और भारतीय अर्थव्यवस्था पर महंगाई का दबाव कम हुआ है।
प्रतिबंधों के बीच बदलते व्यापार मार्ग
2022 से पहले रूसी तेल का भारत के कुल आयात में हिस्सा 1% से भी कम था। लेकिन प्रतिबंधों के बाद यह हिस्सा कई महीनों में 35% से अधिक पहुंच गया। अक्टूबर में 2.9 अरब डॉलर का रूसी तेल आयात इस बात का प्रमाण है कि रूस अब इराक और सऊदी अरब जैसे पारंपरिक सप्लायर्स की जगह भारत के लिए सबसे बड़ा ऊर्जा प्रदाता बन गया है।
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस को यूरोपीय बाज़ारों में भारी कमी का सामना करना पड़ा और उसने अपनी आपूर्ति एशियाई देशों, विशेषकर भारत और चीन, की ओर मोड़ दी। इससे रूस की भारत पर निर्भरता भी बढ़ी है।
भुगतान प्रणाली और मुद्रा विनिमय की चुनौतियाँ
डॉलर आधारित लेन-देन पर लगे प्रतिबंधों के कारण भारत और रूस ने वैकल्पिक भुगतान तंत्र अपनाए। भारतीय रिफाइनरियों ने दिरहम, युआन और आंशिक रूप से रुपये में लेन-देन शुरू किया। इससे व्यापार निर्बाध रूप से चलता रहा।
हालाँकि रूसी बैंकों के लिए रुपये को विदेश भेजने में कठिनाई होने के कारण कुछ बाधाएँ भी सामने आईं। इसके बावजूद दोनों देशों ने मजबूत राजनीतिक रिश्तों के कारण ऊर्जा व्यापार को सुचारू रूप से जारी रखा।
वैश्विक बाज़ार पर प्रभाव
भारत द्वारा रूसी तेल की भारी खरीद ने वैश्विक ऊर्जा समीकरणों को कई तरह से प्रभावित किया है यूरोपीय देशों पर सप्लाई का दबाव घटा, वैश्विक कीमतों में स्थिरता बनी रही, और भारत की घरेलू ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हुई।
अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) का कहना है कि भारत की रणनीति ने उसे वैश्विक बाज़ार की अनिश्चितताओं से बचाया है और भारतीय रिफाइनरियों ने पेट्रोल व डीज़ल का निर्यात बढ़ाकर आर्थिक लाभ हासिल किया है।
आगे की संभावनाएँ
विशेषज्ञों का अनुमान है कि जब तक रूस छूट पर तेल बेचता रहेगा, भारत का आयात स्तर ऊँचा बना रहेगा। सर्दियों और त्योहारी सीज़न के कारण घरेलू मांग भी बढ़ने वाली है, ऐसे में भारत के लिए रूसी तेल एक सुरक्षित विकल्प बना रहेगा।
यदि मध्य पूर्व में तनाव बढ़ता है, तो भारत की रूस पर निर्भरता और अधिक बढ़ सकती है। दोनों देश ऊर्जा क्षेत्र में दीर्घकालिक निवेश और सहयोग पर भी विचार कर रहे हैं।
अक्टूबर के 2.9 अरब डॉलर के आयात आंकड़े इस बात का संकेत हैं कि भारत-रूस ऊर्जा साझेदारी निकट भविष्य में जारी रहने की संभावना है।